सब उल्टा (लघु कथा)
मितिः २०७८ अषाढ ९ गते– हंसा कुर्मीनदियन मे बहुतै पानीबहिगवा रहा । समय करवट बदलतबहुतआगे चलि गै रहा लेकिन रघ्घु कै जिन्दगीजइसै के तइसै । बियाहकिहे दुइ–चार महीनातौ भवा रहा, वोकर मेहरारुइन्द्रमतीवोका घर से निकारि दिहिस रहा । उहौ जिद्दी, सोचिस जब तक रुपयाकमाइकै मकान न बनाय लेब तब तक लउटब नाही ।घर से निकरैक बादसिधै गुजरात चलि गवा । एक ठु कम्पनी मे काम करै लाग । घर छोडे दश महीना बाद, गाँव केर रजुवा बताइस तोहरे बच्चा पयदा भवा है, नाही अइबो ?
रघ्घु एक ओर खुशी भवा लेकिन एक घरि सोचि कै उदास होय गवा । वोकरे दिमाग पर घर से निकरि गवा दिन वाला बाति छाय गवा । राप्ती उतरत के उ बहुतै बेर मुँह धोइस रहाऔ गाँव के ओर घुमि कै देखिस रहा ।उ आपन दशा केहु का सुनायतक नाही पावत रहा । उ तौ सुने औ देखे रहा कि मर्द मेहरारु का निकारि दिहिस कहिकै लेकिन वोकरे साथ ठीक उल्टा भवा रहा ।रजुवा कहियो काल फोन कइकै गाँव कै हा...









