“आल्हा”
आज से चालिस–पचास वर्ष पहिले अवधी समाज मइहाँ गंगा दशहरा से लइकै भादौं मासान्त तक पुरुष वर्ग वालक से लइकै वयस्यक तक के लोगन के बीच अखाडा मइहाँ कूदै औ कुश्ती लडै कय प्रतियोगिता होत रहय, डंड–वैठक, मग्दर भाँजै, लाठी चलावै, अखाडा कूदब जस कसरतै करैक चलन रहय । गाउँ– घर कय बिटिया– बहुरिया झलुवा – झूलत रहीं । यी अवसर मइहाँ झलुवा झूलैं वाली मेंहरुवै “कजरी” ‘सावन’ बारह मासा जस लोक गीत गवति रहीं अउर पुरुष वर्ग “वीरगाथा महाकाव्य” कय रचना ढोलक–मँजीरा के साथ सुनावत रहें । यी काव्य एकल एवं सामूहिक दूनौ तरह से क्षेत्र–क्षेत्र कय अनुसार गावैक चलन रहा । वर्षत मइहाँ कौनव व्यापार– धंधा होत नाय रहय, तब आदमी लोग खाली रहत रहँय वही समय मइहाँ का रहैं अतः सोमवार कय दिन भगवान शंकर कय ब्रत–पूजन–हवन, कीर्तन करत रहें अउर वाँकी दिनन मइहाँ एक्कठै होइकै आल्हा गावैं औ सुनैक खातिर वडा इच्छा करत रहँय ।
अव यी “आल्हा” वास...

