Saturday, March 14सत्यम खबर
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मौत कय खेलौना


फागुन १६ गते, आईतबार
आज से लगभग ६१–६२ बरस पहिले कय ई बात होय जिका हम हियाँ एक लघु कहानी कय रुप मईहाँ प्रस्तुत करयक चाहित हँय ।
विक्रम सम्वत २०१२–०१३ साल कय आस पास कय जेष्ठ–आषाद कय महिना होय । ऊ साल सायद सुखा परय तना भवा रहय । काफी लम्बे समय से पानी नाय गिरा रहय । चारऊ तरफ ताल–तलैया सब सूखि गए रहय । हमरे ई नेपालगंज कय रानी तलऊवा भी सूखि गवा रहय । हमरे साथे खेलैय वाले तमाम साथी रहय । जिन कय साथ हमहू लोग ईधर उधर खेलै चले जावा जात रहय । बाल काल कय साथी मईहाँ बदलू धोबी, अख्तर अली, सुरेश कुमार, बाबूलाल, फैयाज, नारायण गोपाल क्षेत्री, हैदर जईसे प्रमुख रहय । ई मईहाँ कुल हम जोली रहय तव कुछ हम लोगन से ३–४ बरस तक छोट रहय ।
एक दिन कय बात होय हम अउर बदलू दूनौ जने अउर साथी लरिकेन कय साथ अपने घर कय पिछुवारे गड्हा मईहाँ खेलय गवा गा । ई गड्हा ऊ साल सुखाय गवा रहय । तब से आज तलक ई गड्हा पूरा कबहुँ सुखान नाई हय । गड्हा ई मेर सुखाय गवा रहय कि इके उप्पर हम लोग दौडा जात रहय । कहुँ कहुँ तनि नरम रहय । गड्हा कय तलहटी मईहाँ बडे बडे दरार परि गवा रहय । ई दरार मईहाँ कीडा मकौडा, मेघिक बच्चा रहय रहय । गड्हा कय क्षेत्रफल काफी बडा रहय । आज कल कुछ अतिक्रमण से ई कय क्षेत्रफल कुछ सिकुडि गवा हय । उत्तर मईहाँ ई कय चौडाई दक्षिण कय अनुपात से कम रहय । उत्तर मईहाँ थाले पहडिया अउर बाले मुन्ना कय घर जग्गा कय अंश पडत रहय, पूरब मईहाँ खेत लाग मईदान अउर कठमहल (कारबारी बाबा) कय मन्दिर अउर उकय छहरदेवाली परत रहय । ई गड्हा कय पश्चिम मईहाँ खास कईकय बस्ती रहय । दक्षिण मईहाँ भी बस्ती रहय । दक्षिण तरफ झल्लर अउर बिष्णु कय घर जग्गा रहय तब कुछ कुछ हिस्सा भुईहारे, मनसाराम कुम्हार कय परत रहय । जउन दक्षिण पश्चिम कोने पर रहय । जिमा कुछ हिस्सा भरोसे धोबी कय भी परत रहय । र्पिश्चम किनारे पर नरबद धोबी, बिसमिल्ला कय बाप, मुदौउआ रफी, ….. हबीब, चेतराम कुम्हार अउर पश्चिम उत्तर तरफ इमाम बाबा…… सहित अन्य लोगन कय घर अउर जग्गा पडत रहय ।
ई सब लोग जब गड्हा सूखि जात रहय तब ई कय किचला मट्टी निकारि कय घर अंगना अउर देवाल कईहाँ जहाँ लीपत रहय हुँवै अंगना अउर विछुवारा पाटत रहय ।
हम सब लरिके लोग जिमा, बदलू धोबी, सुरेश क्षेत्री, गोपाल के.सी, अख्तर अली अउर बाबूलाल सब लोग मिलिकय लुकी लुकौवर खेला जात रहय । गड्हा कय किनारे पश्चिम तरफ आज कय जईसे पहिले कउनव मेर जादा गन्दगी नाई रहय, न तब चहला रहय । चारौ तरफ किनारे नरकुल कय झमडा रहय । यहिम लुकावा जात रहय । लुकी लुकौवर कय समय हम एक छोट– छोट साँप कय बच्चा देखा जउन सुखान गड्हा कय दरार मईहाँ घुसा जात रहय । तब हमरे मन मईहाँ ऊका, पकरैक इच्छा भवा हम सब साथिन कईहाँ आवाज दइके गोहरावा । सब लोग इकट्ठा भएन अउर ऊ साँप कय बच्चा कईहाँ पकरि लिहा गवा ।
साँप कय बच्चा कईहाँ पकरि कय अब का किहा जाय सब लोग सोचय लागा गवा । तब तक हमरे मईसे एक लरिका दौरि कय हमरे घर से माटी कय एक भुरका लई आवा जिके ऊपर एक दिया भी मूँदय खातिर लई आवा । अब हम ई साँप कय बच्चक वही भुरकम रखिकय बन्द कर दिहा गवा अऊर सब जनेस कहा गवा कि देखौ हियाँ अउर बच्चा होई हम चलौ पकरा जाय तकै काल यही से खेला जाई ।
अतना कहतै भएन कि बदलू सुरेश अउर अख्तर साँप कय बच्चा का पकरै दौरि परे । हम लोग उमर मईहाँ छोट रहेन लेकिन साँप क कइसे पकरा जाय ई बात कय सावधानी जरुर बरता गवा गा रहय । हमय आज भी याद आवत हय । साँप कय पूछ का पकरा जात रहय अऊर तुरन्तय भुरकम रख दिहा जात रहय । साँप कय बच्चा बहुत छोट छोट रहय एक फुट से बडे कउनव नाई रहय ।
ई काम हम लोग बडे चलाकी से किहा गवा रहय । सब से जादा डर हम लोगन का ई रहय कि घर मईहाँ जानि पईहँय तौ हम लोगन का कहुँ घरवाले मारै न । तीन – चार घन्टम हम लोग कमसे कम १५–२० साँप कय बच्चन कईहाँ पकरि कय भुरकम बन्द कई लिहा गवा रहय । अब सामने समस्या ई भई कि ई कहाँ रक्खा जाय । कल्हे इके साथे खेलयक हय । हम लोग साँप कय बच्चन कईहाँ देखि देखि खूब हँसा जात रहय । जब तनिकव, ढकना खुलि जात रहय तब ऊ बच्चा सब बहिरे मूडि निकारयक कोशिस करत रहय तब हम लोग लकडी से झट से दिया बन्द कई दिहा जात रहय । संझा होय लाग रहय । सब लोग ई निर्णय पहुँचे कि ई साँप कय बच्चन कय भुरका बिष्णुक हियाँ अर्थात हमरे जिम्मा रक्खयक लगावा जाय ।
हम ऊ भुरकक बडे मजबूती कय साथ पकडि कय अपने घरे लई आयेन अउर घर कय बहिरे अँगना मईहाँ जहाँ दुकान कय अउर भुरका रक्खे रहँय हुवै बढिया से रख दिहा । सब साथी अपने अपने घरे चले गए । काल्ह दुपहरियम फिर खेलय जाई कहिके ।
हमरे घर मईहाँ मट्टी कय वर्तन बनावैक काम होत रहय । ई वर्तन कय रोज दुबरि पईहाँ स्थान लगावा जात रहय । रोज संझक दुकान कय वर्तन बटोरि कय एक किनारे अँगना मईहाँ रख दिहा जात रहय ।
बहु दिन दुकान बटोरि कय हमार अम्मा जिका हम बुवा कहित रहेन रखि दिहिन रहय । गर्मिक महिना रहय हमरे घर कय उत्तर बगल मईहाँ हमरे पुर्खिन कय बनवावा एक कुँवा रहय । उकै चौतरा बतना बढिहा नाय बना रहय । बगल मईहाँ बरखा अउर कुँवा कय पानी बहै बाली एक नलिया रहय । गर्मिम रात कय कुछ लोग बेना हाँकत कुँवा पर गर्मी काटैक बैठत रहय ।
रात कय खई–पीकै हम सोई गएन थके भी रहेन । सबेरे पछिलहरा जब हमार महतारी बरतन कय दुकान लगावैक सब वर्तन उठाईन अउर दुकान लगाईन ।
पहिले तब ऊ बडे बडे वर्तन उठाईन अन्त मईहाँ छोट वर्तन जब उठाईन अउर जईसे लाईके दुकान पररख्खिन भुरकक मुँह खुलि गवा अउर उमा से साँप कय बच्चा देखिन तब भुरक्क बडी जोर से एक तरफ फेक दिहिन अउर चिल्लाय उठी साँप साँप साँप । आँगना भरेम चारै तरफ साँप कय बच्चा सब फैलिगे रहय । हमरे पिता जी दौरिके आगे आये तब देखिन कि ई तब सब पनिहा साँप कय बच्चा होय डेराव कहतय हमरे महतारिक अपनी ओर बुलाईन अउर कुचरा लईकय सब साँप कय बच्चन कईहाँ बहरि बहरि कय कुँवक बगल वाली नाली तरफ भगाय दिहिन ।
भुरका गिरतय खन साँप कय बच्चा सब जेहर पईन वहरै भागै लागे ई मेर पूरे अँगना भरेम साँपै साँप होइ गवा । इनका बडी मेहनत से नरियम भगावैक पडा ई काम मईहाँ मामा सालिक अउर मकाउ भईया कय विशेष सहयोग भी रहा ।
बाहर कय ई घटना सुनि कय हम चुप–चाप दपके दपके पल्लक आँड मईहाँ लुकाय कय सारा घटना देखा तब डर भी बात कय जादा रहय कि दादा (पिता जी) जान पईहयँ तौ बहुत मरिहयँ ।
हमरे पिता जी भुइहार रहे, साँप काटेक झारत फूकत रहे । कउनव तना से हमरे साथी लोगन से जानिगे ई काम तरिकन कय होय सब का बुलायक डाँटिन अउर उठ बस कराईन रहय । आज भी जब ऊ पुरान घटना क हम याद करित हन तब मन रोमाञ्चित होत हय अउर परिणाम से जू काँपी उठ्त हय । कि हम का ई सबकरैक न चाही । मौत कय खेलौना से खेलयक न चाही ।
(स्रोतः समाज जागरण साप्ताहिक)

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