
श्री मद्भागवद् गीता हिन्दू धर्म का सर्वोपरि ग्रन्थ
है, और भगवान श्री कृष्ण के मुख से निकली है
और गीता का एक महत्व पूर्ण श्लोक है ।
अनन्याश्चिन्तयन्तोमां ये जनाः उपासते ।
तेषां नित्या भियुक्तानां, योग क्षेम वहाम्यहम ।।
ई श्लोक कय सार हय कि हे अर्जुन जउन भी मनुष्य हमार अनन्य भाव से चिन्तन करत हय उका खर्च हम दीत हय, गीता के परम उपासक श्री सन्त बामा थापा जी रहेें, उन अपने पूरै जीवन भर भगवान श्री कृष्ण कय अनन्य चिन्तन करत रहें । अउर उन कय माता जी भी भजन भाव मईहाँ लागी रहत रहीं बामा थापा जी गीता कय श्लोक पढते रहत रहें काहें से कि ऊई जानत रहें, कि हमरे घर कय खर्च तौ भगवान चलाइ हय मने एक दिन तो गजब हो भवा, उन कय महतारी कहिन पूत तू तौ कहत हौ कि भगवान गीता मईहा कहिन हय कि जो उन कय अनन्य भाव से चिन्तन करत हय उन के खर्च भगवान चलावत हय, मने पूत तु तौ भगवान के चिन्तन मइहा रहत हौ अउर हम हूू उन प्रभू के ध्यान मईहा राहत हय, इके वाद कुछ पूत आज घर मइहाँ नाई हय हिंया तक कि एक डररी नकमक नाई हय ।
वामा थापा का लाग कि श्रीमद् भागवद् गीता मइहाँ लिखा श्लोक गलत हय, अउर गीता झूठ हय यही सोंचके गीता मईहाँ लिखा श्लोक का बामा थापा ब्लेट से खुर्च दिहिन अउर बहुत दुःखी होई कय समुद्र के किनारे चले गए अउर मन मईहा बिचार करै लागे कि गीता जस भी ग्रन्थ भी झूठ होई सकत हय तौ फिर कउन ग्रन्थ या पुराण कईहाँ अब सत्य माना जाय, बेरै बेर मन मईहाँ बिचार आवत हय कि अस तौ नाय कि पूरी दुनिया“ कय सब ग्रन्थ झूठ हय, बामा थापा समुद्र के किनारे से घरके अलंग चलि परे अउर सोंचै लागे की गीता जस तौ कोई ग्रन्थ झूठ नाई होई अच्छा भवा कि परिणाम आधे उमर मइहाँ आई गा नय तौ पूरी जिन्दगी बर्वाद होई जात यही सोंचत सोंचत घर के नेरे आयक पहु“चे, पहु“चतै खन उन कय महतारी क्रोधित होई कय आज पहिली दफी अपने लरिका पर ई मेरकय झपट परी अउर बोली कि हे नालायक हत्यारा तू घर से हाली से निकरि जा हम तुहार चेहरा देखैक नाई चाहित हय, बामा थापा एकदम फफकर के रोई परे आखिर आज हमार गौ जस महतारी का होई गा हय ईमेर कय हाथ जोरिके बामा थापा जी पूूछैं लागे कि आखिर महतारी बताव तौ कि हम का गलती किया है आप पूरी उमर मईहा अस फटकारे नाय रहिऊ, महतारी कहिन खबरदार जो तू हमका महतारी कहेव, बहुत निबेदन करेक बाद मइहाँ महतारी पूूछिन कि तू एक सुन्दर छोट बच्चा के उप्पर इतरा बोझा काहे लदेव बामा थापा चौंक गयें कि काउन बच्चा कय बात करत हिंयैं, महतारी गुस्सा से थापा कय हाथ पकरि के देखाइन कि ई देखों, चावल कय बोरा, दाल कय बोरा तेल कय टीन, मिठाई कय डैब्बा ई सब सामान अतरा के बाद बदतमीजी कय हद पार कय दिहेव जब उ नानमून बच्चा इतरा बोझा लांदैक इन्कार कय दिहेव तौ तू उ बच्चाम जुबान (जिहब) काट दिहेव, प्यारा बच्चा रोवत आवा अउर उके मुह से खून निकरत रहै, हम कहा सामान फेक देव इके बाद मुह कहा मुह खोलके देखाव पूत तौ उ कहिस कि आप कय लरिका हमार जबान काट दिहिस हय अउर तुम हमार मुह देख हियौं अतना सुनत थापा जी बेहोस हुई गयें, थोरी देर के वाद उन अपने महतारी से हकीकत बात बताईन कि महतारी हम कोई के बच्चा कय जबान नाय काटा हय, गीता कय श्लोक जरुर काटा हय महतारी ऊ भगवान श्री कृष्ण जी होय ।
हमका प्रायश्चित बताओं महतारी हम बहुत पापी हन् । भगवान तुरुन्त दर्शन दिहिन अउर समझाईन कि पूत गीता कभी गलत नाई हय । विलंब जरुर होई सकत हय, वल्कि दर्शन देत हय । आप भी भगवान से धन पावैक खातिर इच्छा ना किया करो, वल्कि भक्ति पावैक खातिर भगवान से कामना करा करो ।
।। जय श्री कृष्ण ।।
(दयाधाम रोहिणी सेक्टर– ९ दिल्ली भारत)


