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अवधी भाषा एवम् संस्कृति

पुराकाल मइहाँ ‘कोशल’ नाम कय एक बहुत बडा जनपद रहय । आज ‘देश’ कहयक जइसे ‘जनपद’ कहा जात रहय । गौतम बुद्ध कय जनम से बहुत पहिले इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्री राजा लोग यी जनपद कय स्थापना किहिन रहय । उत्तर भारत कय यी जनपद कय सीमा मगध अउर पश्चिमी सीमा कुरु जनपद का छुवत रहय । उत्तर मईहाँ नेपाल कय तराई से लइकय दक्षिण मइहाँ गंगा नदी तक इकय विस्तार आवश्य रहय । अवध कय वर्तमान भाग यी जनपद कय केन्द्रीय भाग रहय । यही कोशल साम्राज्य कय एक भाषा रहय जिका कोसली प्रकृत कहब ठीक रही । कोशल एक सुखी अउर सम्पन्न जनपद रहय यही कारण यी कय भाषा भी खूब फली–फुली रहय । विभिन्न विद्वानन कय मत हय कि यी भाषा लगभग १५–१६ सौं बरस तक प्रमुख सम्पर्क भाषा कय रुप मा रही ।


कोशल मइहाँ जौन इक्ष्वाकु वंशीय आर्य आइके बस गे रहय । विद्वान उनका नब्य आर्य कहत हय काहे की उ लोग स्थानीय लोगन से एक दम घुल मिल गये रहय । यी लोग अपने जाति कइहाँ बचावैक कोई खास जतन नाय किहिन रहय । यी आर्य लोग कुरु आर्य कय बदले कुछ ज्यादै प्रगतिशील रहे । यही इक्ष्वाकु वंशीय आर्य निशाद जनन् से सहयोग लइके मध्य देश, कोशल मइहाँ नये आर्यत्व कय निव डालिन रहय । यही आर्यगण अवध संस्कृति कय आदि पुरुष होंय । यी आर्यत्व मति–धुति–ध्यान, धारणा मइहाँ अउर संस्कार मइहाँ सब से अलग अउर स्वतन्त्र हय ।
मानव जाति कय पाँच मूलभूत नस्ल भारत मइहाँ आय कय बसी रहय । जहाँ तक हय मध्य देश कय गंगाघाटी अथवा कोशल ही एक अइसन क्षेत्र रहय जहाँ नीग्रो, निषाद (आष्ट्रिक या प्रोटो–स्ट्रोलायड), द्रविड, मंगोल या किरात अउर आर्य एक साथे लम्बे समय तक रहे अउर उनहिन कय एक मिलाजुल (समन्वित) नस्ल, संस्कृति, धर्म अउर भाषा कय उदाहरण प्रस्तुत किहिन रहय । यी समन्वय कोई साधारण किसिम कय नाय रहय ।
यी लोग अपनी खास चीजनकय बलिदान कइके नई खास चीजन कइहाँ पाइन रहय । यही कय फलस्वरुप जादा विकसित भाषा अउर जादा विकसित संस्कृति कय स्वरुप प्राप्त किहिन रहय । यिके कारण एक भाषा निरपेक्ष, नस्ल निरंपेक्ष, सर्वतन्त्र स्वतन्त्र जाति सम्भव होइ सका । आज जिका हम लोग अवध संस्कृति कहत हन, उकय निंव निषाद लोग द्रविण कय साथे मिलिकय यही कोशल क्षेत्र मइहाँ रक्खिन रहय । अवध संस्कृति कय लगभग नब्बे प्रतिशत इन्ही कय देन होय ।
ऊपर कोशल कय जउन विशाल साम्राज्य कय चर्चा किया गवा हय उनमा अयोध्या, काशी अउर प्रयाग जइसे महत्व पूर्ण नगर तो रहवय किने, नैभिषारण्य जइसी तपोभूमि भी रही । जहाँ अठ्ठासी हजार ऋषि लोग तपस्या किहिन रहय । नैमिषारण्य भारत कय अरण्य संस्कृति कय एक अद्वितीय केन्द्र रहा हय । जहाँ यज्ञ–योग, मनन–चिन्तन अउर अध्ययन–अध्यापन कय संस्कृति कय बहुत विकास भवा । कथा वाचन संस्कृति कय तो यी आदि केन्द्र होय । नैमिषारण्य मइहाँ ही बेदव्यास जी बेदन कय विभाजन अउर सम्पादन किहिन रहय । अठ्ठारह पुराण कय रचना भी यही किहिन रहय । यही सूत जी शौनक आदि ऋर्षन कइहाँ कथा सुनाईन रहय । यी सूतौं कय कथा वाचन संस्कृति कय सुपरिणाम होय कि पुराण–कथा पूरे अवधै क्षेत्रय मइहाँ नाही, भारत भूमि, सुदूर मध्य पश्चिम नेपाल अउर दक्षिण पूर्व एशिया मइहाँ पहुँची रहय ।
पुराण कथन मइहाँ सबसे जादा ‘रामकथा’ कय प्रचार भवा । जहाँ जहाँ अवध के लोग पहुँचे, यी धर्म पहुँचा हुवाँ–हुवाँ, अवध संस्कृति भी पहुँची हय । यी सर्वविदित सत्य हय कि अयोध्या शब्द कय मूल मइहाँ ‘अवध’ शब्द दिपा हय । अवध वासियन कय खातिर यी गर्व कय बात होय कि अवध संस्कृति अउर धार्मिक आस्था ही नाई, हियाँ कय कथा अउर साहित्य कय परिपाटी, नगरन कय नाम, नदियन कय नाम, व्यक्ति वाची नाम, यी सब देश विदेश मा पहुँचे हय । जिनका आज भी महत्व दिया जात रहा हय । यी सच्चाई भी हय कि ‘राम’ शब्द पुराकाल कय एशिया अउर यूरोपमा लोग भली भाँति जानत रहे ।
कोशल कय जउन समन्वय मूलक संस्कृति कय चर्चा ऊपर किया गवा हय, उमा हमका सहनशीलता सिखावत हय । अउर सह अस्तित्व तथा सहभागिता कय उदाहरण प्रस्तुत करत हय । यी समन्वय कय सन्दर्भ मा डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी लिखन हय कि यही नाना जातियन कय नाना आचरन, विचारन, विश्वासन, संस्कारन कय सम्मिलित रुप होय अवध संस्कृति । यी विशुद्ध अर्या संस्कृति भी नहोय । विशुद्ध आर्येतर संस्कृति भी नहोय । लम्बे समय कय मिलन, संघर्ष, आदान अउर प्रदान, ग्रहण अउर त्याग कय फल स्वरुप बनी यी संस्कृति होय । द्विवेदी जी कय यी विचारन कय पुष्टि डा. सुनीतकुमार चटर्जी कय पुस्तक से भी होत हय ।
कोशल कय रामकथा कय सन्दर्भ मा कहाँ गवा हय कि यी कथा गाथा गायन कय लोक परम्परा से जुडी रही हय । यी कथा गाथा कय अलावा भी अन्य लोक कथा गाथा भी लोक भाषा मा गाई जात रही हय । अवध मइहाँ कथा गायन कय परम्परा भी बहुतय पुरान हय । यी गाथा अवधी कय प्राचीन रुप कोशल प्राकृति से शुरुवात भवा । गाथा–गायन कय यी प्राचीन परम्परा बहुतय प्रचिलित भी रही हय । राजा भरथरी गीत, मछिन्दर चरित, आल्हा चरित, गोपीचन्द गीत, बेहुला गाथा, अउर लोरिक चरित आदि अवधी कय लोकप्रिय गाथा होय ।
अवधी खास कइके कोसली प्राकृति कय विकसित रुप होय, इकय साहित्यिक परम्परा भी प्राचीन हय । सम्पूर्ण जनपदीय भाषन मइहाँ अवधी ही एक भाषा कय रुप मइहाँ सामने आईहय । अवधी कय प्रथम कवि ‘मुल्ल दाउद’ चौदहवी शताब्दी मइहाँ काब्य रचना कय शुरुवात किहिन रहय । इन से पहिले बारहवी सताब्दी मइहाँ दामोदर भट्ट संस्कृति कय समानान्तर मइहाँ ‘उक्ति–व्यक्ति–प्रकरण’ नामक ग्रन्थ मइहाँ अवधी व्याकरण कय रचना कर दिहिन रहय । यी इव बात कय प्रमाण होय कि अवधी बारहवी शताब्दी तक एक भाषा कय रुप मइहाँ विकसित होइ चुका रहय ।
डा. रामविलाश शर्मा जी कय हिसाब से काब्य परम्परा कय सन्दर्भ मा विचार करतय कहत हय कि यी परम्परा ‘मुल्ला दाउद’ से पहिले से भी शुरु रहय । मुल्ला दाउद से शुरु हुइके सुफी काब्य परम्परा, अवधी मइहा“ लम्बे समय तक बची रही । यी परम्परा प्रबन्ध काब्य कय होय । मलिक मोहम्मद जायसी कय ‘पदमावत’ यी काब्य परम्पा कय सबसे उत्तम ग्रन्थ होय । भक्त कवि सन्त शिरोमणी गोश्वामी तुलसीदास जी महाराज रचित ‘श्रीरामचरित मानस’ तो एक अस ग्रन्थ हय जिपर समस्त अवधवाशी गौरव करत हय । समस्त अवधवाशीन कय गौरव बनी हय । यी काब्य का विदेशन मा भी बहुतय आदर मिला हय ।
आज अवधी संस्कृति कय जउन रुप हमरे सामने हय उपर रामकथा कय अमिट छाप हय । अवधी कय कोई प्रतीक पुरुष है तो वह श्री राम हय । कोई देवता हय तो ‘श्री राम’ के आराध्य ‘श्री शंकर’ हय, कोई नदी है तो वह शिव प्रिय गंगाजी हय । कोई ऋतु हय तो बसन्त ऋतु हय । जिमा राम बनवाश से लौट के अयोध्या आवत हय । कोई लोक नाट्य हय तो वह है ‘रामलीला’ रस है तो वीर रस लोक गायन हय तो वह है आल्हा । कोई फल हय तो वह हय ‘आम’, कोई फसल हय तो वहहय ‘सुरस रशीली‘, ईख (गन्ना) । यही प्रतीक अउर उपकरण से अवध कय लोक जीवन अउर संस्कृति कय पहिचान बना हय ।
सामान्य रुप से अवध संस्कृति सब जगह एक मेर दिखाई देत हय । जहाँ तक उत्तर भारत अउर नेपाल कय पश्चिमी दक्षिणी तराई मधेश इलाका कय बात हय यी संस्कृति लगभग सबका एक सूत्रमा बाँधे हय । सूक्ष्म रुप से देखे पर कुछ क्षेत्रीय भिन्नता दिखाई पड सकत हय । भोजन, वास्त्र–तित्–त्यौहार, आमोद–प्रमोद, मेला–ठेला, सब एक जइसन
हय । यदि विचार कय स्तर देखा जाय तो बेदान्त, भोजन मइहाँ, दाल, भात, दही, तरकारी, कपडा, लत्ता मइहाँ धोती कुरता, बनियाइन, जाँघिया, यातायात कय साधन लढिया, बैलगाडी यी सबै अवध संस्कृति कय आधार रहे हय ।
हियाँ अवधी या कोशली भाषा अउर संस्कृत कय जउन सार–संक्षेप मइहाँ विवरण पेश किहा गवा हय । यी उद्देश्य अवधी कय संकीर्णता कय जन्म देयक नाय होय । बल्की मानव जाति अउर सभ्यता का सम्झ्यम सहयोग करैक उद्देश्य होय । मानव जाति कय विकास का सम्भ्mयक के खातिर यी उत्तम भूमि होय ।
डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी कहत हय कि ‘हमय यी विचार करैक चाही कि अखिल मानव जाति कय निर्मित संस्कृति कइहाँ भारत कय अवदान का होइ सकत हय । अवध वासियन कय यी सन्दर्भ मा सोंचयक चाही ।
नेपाल कय दक्षिण पश्चिम कय महाकाली नदी से पूर्व अउर चूरे पहाड कय तलहटी से लगभग भित्री मधेश कय कुछ इलाका मइहाँ एवम् नारायणी नदी कय पश्चिम सम्पूर्ण इलाका अवधी इलाका कय रुपमा जाना माना जात
हय । यी इलाका मइहाँ, बाँके, बर्दिया, कैलाली, कंचनपुर, दाङ्ग, देउखुरी, कपिलवस्तु, रुपन्देही, नवलपरासी आदि जिला परत हय ।
सन्दर्भ सामग्रीः
आपनि धरती, आपन धाम, डा. अरुण त्रिवेदी

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