
गजल

तिरी गजलों की चाहत ने तो दीवाना बना डाला,
जलाकर आग मेरे दिल को परवाना बना डाला ।
कभी लिखती हूँ मां पर तो कभी लिखती पिता पर हूँ,
कभी महबूब की चाहत में अफसाना बना डाला ।।
मिलाती हूँ नजर उससे नशा– सा होने लगता है,
नजर को उसने जैसे अपनी पैमाना बना डाला ।
वो कहता रोज मुझसे है तिरी आँखें नशीली हैं,
मिरी आँखों को उसने हाय मयखाना बना डाला ।।
छतो पर झूम के गाने लगी हूँ प्यार के नगमे,
निगोडी रिमझिमों ने मुझको मस्ताना बना डाला ।
ये कैसा आ गया है वक्त मतलब के हुए रिश्ते,
खदी को खुद से इंसां ने यूकक अनजाना बना डाला ।।
सनम से काश कह दे ‘राज’ कोई बात इतनी सी,
जुदाई ने हमारे घर को वीराना बना डाला ।।
ग्राम÷ पोस्ट– राजपुरा (सिसाय)
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